मंगलवार, 1 अगस्त 2023

हनुमान चालीसा


 

दोहा

श्रीगुरु चरन सरोज रज, निजमन मुकुरु सुधारि। बरनउं रघुबर बिमल जसु, जो दायक फल चारि।।
बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार। बल बुधि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार।।

चौपाई

जय हनुमान ज्ञान गुन सागर। जय कपीस तिहुं लोक उजागर।।
राम दूत अतुलित बल धामा। अंजनि-पुत्र पवनसुत नामा।।
महाबीर बिक्रम बजरंगी। कुमति निवार सुमति के संगी।।
कंचन बरन बिराज सुबेसा। कानन कुण्डल कुँचित केसा।।
हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजे। कांधे मूंज जनेउ साजे।।
शंकर सुवन केसरी नंदन। तेज प्रताप महा जग वंदन।।
बिद्यावान गुनी अति चातुर। राम काज करिबे को आतुर।।
प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया। राम लखन सीता मन बसिया।।
सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा। बिकट रूप धरि लंक जरावा।।
भीम रूप धरि असुर संहारे। रामचन्द्र के काज संवारे।।
लाय सजीवन लखन जियाये। श्री रघुबीर हरषि उर लाये।।
रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई। तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई।।
सहस बदन तुम्हरो जस गावैं। अस कहि श्रीपति कण्ठ लगावैं।।
सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा। नारद सारद सहित अहीसा।।
जम कुबेर दिगपाल जहां ते। कबि कोबिद कहि सके कहां ते।।
तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा। राम मिलाय राज पद दीन्हा।।
तुम्हरो मंत्र बिभीषन माना। लंकेश्वर भए सब जग जाना।।
जुग सहस्र जोजन पर भानु। लील्यो ताहि मधुर फल जानू।।
प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं। जलधि लांघि गये अचरज नाहीं।।
दुर्गम काज जगत के जेते। सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते।।
राम दुआरे तुम रखवारे। होत न आज्ञा बिनु पैसारे।।
सब सुख लहै तुम्हारी सरना। तुम रच्छक काहू को डर ना।।
आपन तेज सम्हारो आपै। तीनों लोक हांक तें कांपै।।
भूत पिसाच निकट नहिं आवै। महाबीर जब नाम सुनावै।।
नासै रोग हरे सब पीरा। जपत निरन्तर हनुमत बीरा।।
संकट तें हनुमान छुड़ावै। मन क्रम बचन ध्यान जो लावै।।
सब पर राम तपस्वी राजा। तिन के काज सकल तुम साजा।।
और मनोरथ जो कोई लावै। सोई अमित जीवन फल पावै।।
चारों जुग परताप तुम्हारा। है परसिद्ध जगत उजियारा।।
साधु संत के तुम रखवारे।। असुर निकन्दन राम दुलारे।।
अष्टसिद्धि नौ निधि के दाता। अस बर दीन जानकी माता।।
राम रसायन तुम्हरे पासा। सदा रहो रघुपति के दासा।।
तुह्मरे भजन राम को पावै। जनम जनम के दुख बिसरावै।।
अंत काल रघुबर पुर जाई। जहां जन्म हरिभक्त कहाई।।
और देवता चित्त न धरई। हनुमत सेइ सर्ब सुख करई।।
सङ्कट कटै मिटै सब पीरा। जो सुमिरै हनुमत बलबीरा।।
जय जय जय हनुमान गोसाईं। कृपा करहु गुरुदेव की नाईं।।
जो सत बार पाठ कर कोई। छूटहि बन्दि महा सुख होई।।
जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा। होय सिद्धि साखी गौरीसा।।

तुलसीदास सदा हरि चेरा। कीजै नाथ हृदय महं डेरा।।

दोहा
पवनतनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप।
राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप।।

जय श्रीराम, जय हनुमान, जय हनुमान।


मंगलवार, 30 अगस्त 2022

Ganesh Chaturthi 2022,


 गणपति बप्पा मोरया 


 


 Ganesh Utsav: गणेश चतुर्थी का पर्व 31 अगस्त 2022 (Ganesh chaturthi 2022 date) से शुरु हो रहा है. 10 दिन तक घर में मंगलमूर्ति गणेश जी की प्रतिमा स्थापित की जाती है. अनंत चतुर्दशी तक धूमधाम से बप्पा का उत्सव मनाया जाता है. गणेश चतुर्थी को विनायक चतुर्थी भी कहा जाता है. मान्यता है कि इन दस दिनों में जो सच्ची श्रृद्धा से रिद्धी सिद्धि के दाता गणपति जी कि उपासना करता है उसके सारे विघ्न बप्पा हर लेते हैं. गौरी पुत्र गजानन को की स्थापना शुभ मुहूर्त में करने से सुख-समृद्धि की आती है. किन मुहूर्त में करें गणेश जी की आराधन ? कब है होगा गणेश जी का विसर्सन? क्यों मनाते हैं गणेश चतुर्थी? आइए जानते हैं


 गणेश चतुर्थी 2022 खास संयोग (Ganesh chaturthi 2022 Yoga)


बुधवार का दिन गणेश जी को समर्पित है. इस साल गणेश चतुर्थी 31 अगस्त 2022 बुधवार के दिन पड़ रही है. साथ में इस बार गणेश चतुर्थी पर रवि योग भी बन रहा है. ऐसे में गणेश उत्सव की शुरुआत बेहद शुभ संयोग में हो रही है.


 गणेश चतुर्थी 2022 शुभ मुहूर्त (Ganesh chaturthi 2022 shubh muhurat)


भाद्रपद शुक्ल पक्ष चतुर्थी तिथि शुरू - 30 अगस्त 2022, दोपहर 3.33 मिनट से भाद्रपद शुक्ल पक्ष चतुर्थी तिथि खत्म - 31 अगस्त 2022, दोपहर 3.22 मिनट तक

गणेश स्थापना मुहूर्त - 11.05 AM - 1.38 PM (31 अगस्त 2022, बुधवार)

रवि योग - 31 अगस्त 2022, 06.06 AM - 1 सितंबर 2022, 12.12 AM

अनंत चतुदर्शी - 9 सितंबर 2022 (गणेश विसर्जन डेट)


 गणेश चतुर्थी क्यों मनाते हैं ? (Why celebrate ganesh utsav)

पौराणिक कथा के अनुसार गणेश चतुर्थी को गणेश जी के जन्मोत्सव के रूप में मनाते हैं. महर्षि वेदव्यास जी ने महाभारत की रचना के लिए गणेश जी का आह्वान किया था और उनसे महाभारत को लिपिबद्ध करने की प्रार्थना की. कहते हैं गणेश चतुर्थी के दिन ही व्यास जी ने श्लोक बोलना और गणपति जी ने महाभारत को लिपिबद्ध करना शुरू किया था. 10 दिन तक बिना रूके गणपति ने लेखन कार्य किया. इस दौरान गणेश जी पर धूल मिट्‌टी की परत जम गई. 10 दिन बाद यानी की अनंत चतुर्दशी पर बप्पा ने सरस्वती नदी में कर खुद को स्वच्छ किया. तब से ही हर साल 10 दिन तक गणेश उत्सव मनाया जाता है.

शुक्रवार, 26 अगस्त 2022

कृष्ण तत्व

 भगवान श्रीकृष्ण केवल वंशी बजाना ही नहीं जानते अपितु शंख बजाना भी जानते हैं। वंशी जहाँ अंतः आनंद की प्रतीक है। स्थिर जीवन की प्रतीक है, शांत और सुखी जीवन की प्रतीक है। वही दूसरी तरफ शंख एक ललकार, एक उद्घोष और एक विद्रोह है अन्याय, अत्याचार और अधर्म के विरूद्ध। 

 

भगवान श्री कृष्ण ने अपने जीवन के प्रारंभ काल में केवल वंशी ही बजाई लेकिन उसके बाद का शेष जीवन ज्यादातर शंख बजाने में ही गुजारा। इसका सीधा सा अर्थ यह हुआ कि जीवन में धैर्य और सहनशीलता का अपना विशेष महत्व है।


लेकिन हमारा मौन, हमारा धैर्य और हमारी सहनशीलता भी यदि अधर्म को प्रश्रय दे रही हो तो वो स्वयं के साथ साथ सम्पूर्ण मानव जाति के लिए भी अति अनिष्टकारी और कष्टकारी बन जाती है।


भगवान कृष्ण का वंशीनाद मौन की तरफ संकेत करता है और शंखनाद विद्रोह की तरफ। विद्रोह अंधविश्वास के साथ, विद्रोह कुंठित परंपराओं के साथ, विद्रोह अत्याचारियों के खिलाफ, विद्रोह अन्यायियों और स्वार्थ में जकड़ी राजसत्ता के खिलाफ।


स्वयं के सुख की वंशी अवश्य बजाओ लेकिन जरूरत पड़े तो धर्म रक्षा के लिए शंखनाद करने का साहस भी अपने भीतर उत्पन्न करो। केवल वंशी बजती तो श्रीकृष्ण और उसके आसपास के लोग ही सुखी हो पाते लेकिन शंखनाद हुआ तो धर्म रक्षा के साथ - साथ समस्त जगत और प्राणी मात्र के सुख का द्वार खुल पाया।

सुप्रभात

 ।। ॐ जय श्री राम ।। 

।। ॐ नमः शिवाय ।।

।। ॐ हं हनुमते नमः।।


रामचरितमानस मुनि भावन ।

बिरचेउ संभु सुहावन पावन ।।

त्रिविध दोष दुख दारिद दावन । 

कलि कुचालि कुलि कलुष नसावन ।।


( बालकांड 34/5) 

 

मानसजी के आरंभ में अपनी रचना के बारे में बताते हुए तुलसी बाबा कहते हैं कि यह रामचरितमानस मुनियों का प्रिय है। इस सुहावन व पावन मानस की रचना शिवजी ने की है। यह तीनों प्रकार के दोषों, दुखों, दरिद्रता एवं कलियुग के दुराचार व सब पापों का नाश करने वाला है।

    प्रभु, हम सब यही चाहते हैं कि हमारे दोष दूर हो जाएँ, दुख समाप्त हो जाए व संपन्नता आ जाए। जगत के कल्याण हेतु यह शिवजी की रचना है। अस्तु जो भी इसे पढ़ेगा, गुनेगा उसका जीवन हर प्रकार से समृद्ध हो जाएगा — श्रीराम , जय राम , जय जय राम

आपका दिन मंगलमय हो,आप स्वस्थ रहे,प्रसन्न रहे।

              जय श्री राम

सुविचार

 प्रतिपल प्रभुपद वंदन ही जीवन का सार है, शेष सब निःस्सार है, इस प्रक्रिया को स्वांस का प्रश्रय लेकर ही आगे बढा़या जा सकता है, जैसा कि स्पष्ट भी है:- 


योगिनां ह्रदये रमन्ते यः सः रामः


जो समस्त प्राणियों में रमण करता है वही राम है, और वह स्वांस ही है अतः स्वांस-स्वांस पर नाम भज, 


व्रथा स्वांस ना खोय, ना जाने इस स्वांस का आवन होय न होय।

शनिवार, 20 अगस्त 2022

Essence of Janmashtmi




 No one remembers the girl baby born on the same day who was interchanged with Krishna, a boy baby, to save his life. The boy's life was precious but the girl was born to sacrifice her life. Today is not only the birthday of Krishna but also of Yogamaya.

It is said that Yogmaya flew off to Heavens freeing herself from the clutches of Kansa while announcing to Kansa that your killer has been born. Scriptures do not clearly mention that she too got killed like other siblings of Krishna. However more knowledgeable are requested to throw light on it.

Yogmaya was also an incarnation of Shakti who came to be born along with the incarnation of Lord Vishnu to keep some old promise. When Kansa caught her by her feet and hurled her to the ground, she flew towards the heaven, saying “Kansa, your killer has already taken birth. I could have also killed you but since you caught me by my feet, I take it as your expression of humility and am pardoning you”.

 Krishna was born in the darkness of the night, into the locked confines of a jail.

However, at the moment of his birth, all the guards fell asleep, the chains were broken and the barred doors gently opened.

Similarly, as soon as Krishna (Chetna, Awareness) takes birth in our hearts, all darkness (Negativity) fades.

All chains (Ego, I, Me, Myself) are broken.

And all prison doors we keep ourselves in (Caste, Religion, Profession, Relations etc) are opened. 

And that is the real Message and Essence of Janmashtmi.


गुरुवार, 30 दिसंबर 2021

भक्ति की शक्ति


एक गाँव के बाहर छोटा सा शिव मन्दिर था, जिसमें एक वृद्ध पुजारी रहते थे। एक दिन एक गरीब माँ अपने नन्हे से बालक को मन्दिर के द्वार पर छोड़कर चली गई। बहुत खोजने पर भी पुजारीजी को बालक के परिवार का कुछ भी पता न चला।
जब गाँव का भी कोई व्यक्ति उस बालक का लालन-पालन करने को तैयार न हुआ तो पुजारीजी ने भगवान् शिव की इच्छा समझकर उसे अपने पास रख लिया और उसका नाम भोला रख दिया।
गाँव के श्रद्धालु भक्तों से जो कुछ प्राप्त होता, उसी से भगवान् शिव का, पुजारीजी का और बालक भोला का किसी तरह गुजारा चलता। यदि किसी दिन कम भी पड़ता तो पुजारीजी बालक और भगवान् को भोग लगाकर स्वयं गंगाजल पीकर रह जाते।
धीरे-धीरे भोला बड़ा होने लगा और अब वह पुजारीजी के कामों में हाथ बँटाने लगा। वृद्ध पुजारीजी के थके-हारे हाथों को कुछ आराम मिलने लगा, इसलिए उन्होंने भोला को मन्दिर की सफाई, भगवान् शिव की पूजा, उनको भोग लगाने और उनकी आरती करने की विधि अच्छी प्रकार समझा दी। अब वे स्वयं भगवान् शिव के नाम जप और संकीर्तन में समय व्यतीत करने लगे।
एक दिन भगवान् शिव के मंगलकारी नाम शिव, शिव, शिव, शिव का जप करते हुए ही उनके प्राण छूट गए। अब बालक भोला का इस संसार में भगवान् शिव के सिवा और कोई सहारा न रहा। उसने पुजारीजी की ये तीन बातें कभी नहीं भूलीं...
01. भगवान् भोलेनाथ शिव शंकर को ताजी-गर्म रसोई का ही भोग लगाना।
02. भगवान् को भोग लगाए बिना स्वयं कुछ भी नहीं खाना।
03. भगवान् शिव पर विश्वास रख कर कभी भी किसी भी वस्तु का संग्रह न करना, बासी भोजन का भी नहीं।
यदि कोई भक्त पहले से बना भोजन या मिठाई मन्दिर में दे जाता, तो बालक भोला उसे गरीबों में बाँट देता। वह ताजी रसोई बनाकर ही भगवान् को भोग लगता, उसके बाद ही स्वयं प्रसाद ग्रहण करता और यदि बचता तो उसे बाँट देता। यदि रसोई बनाने को सामग्री न होती, तो भोलेबाबा और भोला भगत दोनों गंगाजल पीकर ही रह जाते।
एक बार बरसात का मौसम आया और तीन-चार दिन तक मूसलाधार वर्षा होने से मन्दिर में एक भी भक्त नहीं झाँका। भोला अपने भोलेबाबा को गंगाजल का ही भोग लगाता और उसे ही पीकर रह जाता। भोले बाबा बालक की भक्ति और सहनशक्ति की परीक्षा लेते रहे।
किन्तु आखिर में अपने भक्त बालक को भूख से तड़पते देख उनसे रहा न गया। वे सेठ के नौकर का रूप धरकर, हाथ में भोजन सामग्री की पोटली लेकर वर्षा में भीगते हुए मन्दिर के द्वार पर जा पहुँचे। उन्होंने आवाज लगाकर भोला को बुलाया और उसके हाथ में पोटली देते हुए बोले, "सेठजी ने यह सीधा (कच्चा राशन) भेजा है। इससे रसोई बनाओ, भोग लगाओ और स्वयं भी प्रसाद पाओ। मैं कल फिर आऊँगा।"
भोला भगत ने आशीर्वाद देकर उसे विदा किया और सूखी-गीली लकड़ियों के धुएँ में गर्म रसोई बनाकर भोलेबाबा को भोग लगाया। पूरे बरसात के मौसम में भोलेबाबा नौकर के वेष में भोला भगत को सीधा देने आते रहे और स्वयं भी गर्मागर्म रसोई का भोग पाते रहे।
एक दिन भोला भगत ने सोचा कि सेठजी को सीधा भेजते हुए चार महीने हो चले हैं, किन्तु वे स्वयं कभी मन्दिर में भोले बाबा का प्रसाद ग्रहण करने नहीं आए।
अगले दिन जब भोले बाबा नौकर के वेष में सीधे की पोटली देने आए तो भोला भगत उनसे बोला, "भाई ! तुम्हारे इतने धर्मात्मा सेठजी कभी स्वयं मन्दिर में प्रसाद लेने नहीं आए। इस कारण मेरा हृदय अत्यंत दुःखी हो रहा है। अपने सेठजी से कहना कि कल वे भी मन्दिर में प्रसाद ग्रहण करने अवश्य पधारें।"
भक्त की बात सुनकर नौकर बने भोलेबाबा चौंककर घबरा उठे और बोले, "पुजारीजी ! "सेठजी मेरे द्वारा आपको सीधा भेजते हैं, आप इससे भगवान् को भी भोग लगा लेते हैं और स्वयं भी प्रसाद पाते हैं। फिर सेठजी को बीच में बुलाने की क्या जरुरत है ? जैसा चल रहा है, वैसे ही चलने दीजिए न।"
भोला बोला, "ऐसे कैसे चलने दूँ ? आपके धर्मात्मा सेठजी इतने दिनों से सीधा भेज रहे हैं, क्या मैं उन्हें भगवान् का प्रसाद देने का अपना कर्तव्य भी पूरा न करूँ ? मैं किसी का उधार खाने वाला नहीं हूँ। अपने सेठजी से कह देना कि यदि कल भोले बाबा का प्रसाद ग्रहण करने न पधारे, तो मैं उनका सीधा लेना बन्द कर दूँगा।"
नौकर बने भोलेबाबा तो अपने भोले भगत की अकड़ देखकर काँप उठे और यह सोचकर मन ही मन हँसे कि वाह ! आज तो लेने वाला ही देने वाले पर धौंस दिखा रहा है। लेकिन सरल हृदय भक्त के मनोभाव पर रीझकर वे बोले, "ठीक है पुजारीजी ! कल सेठजी मन्दिर में प्रसाद ग्रहण करने जरूर पधारेंगे।"
दूसरे दिन बड़े सबेरे ही भोलेबाबा नौकर के वेष में दूध और बहुत सारी भोजन सामग्री लेकर मन्दिर पहुँच गए।
भोला चौंकते हुए बोला, "भाई ! आज इतना सारा सीधा किसलिए ले आए ?"
नौकर बने भोलेबाबा बोले, "पुजारीजी ! भूल गए क्या ? आज आपने सेठजी को प्रसाद के लिए बुलाया है। इसलिए आप छककर रसोई बनाइए और भोलेबाबा को भोग लगाइए। हाँ ! यह तो बता दीजिए कि सेठजी किस समय पधारें ?"
भोला ने प्रसन्न होकर उन्हें सेठजी के आने का समय बता दिया। और भोलाभक्त की इच्छा पूर्ण करने के लिए भोलेबाबा कैलाश पर सेठ का रूप धारण करने लगे।
इधर अपने स्वामी को एक प्यारे भक्त के यहाँ जीमने जाने का समाचार सुनकर ममतामयी अन्नपूर्णा माँ पार्वती भी भला कैसे पीछे रहतीं ? वे भी पति की आज्ञा लेकर सेठानी का रूप धारण करने में जुट गईं।
भोलेबाबा ने अपने गले से मुंडों की माला उतार दी, शरीर पर लगी भस्म, कमर पर पहना हुआ बाघांबर और बाँहों और कानों में पहने साँपों के हार भी उतारकर रख दिए।
उन्होंने एक मखमल का सुन्दर कुर्ता धारण कर लिया। अपनी जटाएँ सीधी कर गंगा और चंद्रमा को उसमें छिपा लिया और ऊपर से एक सुन्दर रंग-बिरंगी पगड़ी पहन ली। सदैव नंगे पैर विचरण करने वाले शिवजी ने आज अपने पैरों में रेशमी जूतियाँ धारण कर लीं। हाथ का त्रिशूल और डमरू भोलेबाबा ने नन्दी के हाथ में थमा दिया और अपने हाथ में एक सुन्दर छड़ी लेकर पार्वतीजी के तैयार होने की प्रतीक्षा करते हुए कैलाश पर चहलकदमी करने लगे।
पार्वतीजी घंटों से मेकअप करने में जुटी हुईं थीं। उन्होंने आज अपने पतिदेव के नगर में बनी सुन्दर बनारसी साड़ी निकालकर पहनी, जिसका रंग सेठ बने शिवजी के कुर्ते से मैच कर रहा था। उन्होंने सोने-चाँदी-हीरे के जगमगाते हुए आभूषण धारण कर लिए, पैरों में सुन्दर सैंण्डल पहन लीं, बगल में सुन्दर-सा पर्स दबा लिया और भोले बाबा के बार-बार आवाज लगाने के बाद श्रृंगार कक्ष से बाहर निकलकर आईं।
जब पार्वतीजी और शिवजी ने एक-दूसरे को सेठ-सेठानी के वेष में देखा, तो वे चकित होकर एक-दूसरे को निहारते ही रह गए। दोनों एक-दूसरे को देख-देखकर निहाल हुए जा रहे थे। इससे पहले उन्होंने कभी एक-दूसरे का ऐसा सुन्दर रूप देखा ही नहीं था।
जब भगवान् गौरीशंकर सेठानी-सेठ का रूप धरकर कैलाश से अपने भक्त के यहाँ दावत उड़ाने चले, तो गणेश, कार्तिकेय, नंदी, ऋषि-मुनि, देवता, देवाङ्गनाएँ भी उन्हें देखकर ठगे से रह गए। सेठ बने शिवजी अपने हाथ में ली हुई छड़ी को अदा से घुमाते हुए पृथ्वी पर टेकते हुए चल रहे थे, और उनके पीछे-पीछे बगल में पर्स दबाए, अपनी सैंण्डल से टक-टक और पायलों से छन-छन की मधुर ध्वनि करती हुई माँ पार्वती सेठानी बनी हुई चल रही थीं।
भोला भगत आज सुबह से ही सेठजी के स्वागत में भाँति-भाँति के पकवान बनाने में जुटा हुआ था। अपने भोलेबाबा का भोग तो वह चलते-फिरते बना लेता था, किन्तु आज उसे कई महीने से भगवान् को भोग लगाने के लिए सीधा भेजने वाले सेठजी को भगवत्प्रसाद देना था, अतः आज उसने अपनी सारी पाककला झोंक डाली थी।
उसने सेठजी द्वारा भेजे हुए चावल धोकर खीर बनाई, उसे धीमी आँच पर पकाकर गाढ़ा किया और उसमें सेठजी के द्वारा भेजे हुए पिस्ते, बादाम, केसर, चिलगोजे, किशमिश डाले। मिर्च और अदरख को कूटकर, उसे बाजरा, बेसन और गेहूँ के आटे में भर-भरकर मोटे-मोटे मिस्से टिक्कड़ बनाए।
रसोई बनाकर भोला भगत पुनः स्नान करने चला गया ताकि स्वच्छ वस्त्र पहनकर भोले बाबा को भोग लगा सके और सेठजी को उनका प्रसाद पवा सके।
जब भोला भगत स्नान करके लौटा तो देखा सेठजी प्रसाद ग्रहण करने के लिए स्वयं तो आए ही हैं, संग में अपनी सेठानीजी को भी ले आए हैं।
भोला ने झट दोनों से राम-राम की, उन्हें आसन देकर बैठाया और बोला, "मैं अभी भगवान् को भोग लगाकर आता हूँ, फिर आपको प्रसाद परोसूँगा।"
भावना के भूखे भोलेबाबा से भूख सहन नहीं हो पा रही थी। इसलिए वे बोले, "पुजारीजी ! भगवान् को जल्दी से भोग लगाइए, मुझसे भूख सहन नहीं होती।"
भोला भगत बोला, "सेठजी ! भूख तो मुझे भी बड़े जोर से लग रही है, किन्तु मैं अपनी भूख के कारण भगवान् को भोग लगाना नहीं भूलता। यदि दुनिया के सारे लोग इसी तरह अपनी भूख के लिए भगवान् को भोग लगाना भूल जाएँ तो भगवान् तो भूखों मर जाएँगे।"
सेठजी बने भोलेबाबा एक पत्तल उठाते हुए बोले, "पुजारीजी ! आप भोग लगाइए। इधर मैं पत्तल परोस लेता हूँ। मुझसे भूख सहन नहीं हो पा रही है।"
भोला भगत सेठजी बने भोलेबाबा को डाँटते हुए बोला, "सेठजी ! भगवान् के काम में न तो जल्दीबाजी चलती है और न कंजूसी। मैं जब तक भगवान् को भोग नहीं लगा लेता, आप रसोई के पास भी नहीं फटक सकते। चुपचाप इधर बैठ जाइए और 'ॐ नमः शिवाय्' जपते रहिए। मैं अभी आता हूँ और आपको पेट भर भोजन कराता हूँ।"
सेठ बने शिवजी डाँट खाकर चुपचाप अपने आसन पर जा बैठे। सेठानी बनी पार्वती उनकी यह दशा देख बड़ी मुश्किल से अपनी हँसी रोक पाईं।
लेकिन जैसे ही भोला भगत पत्तल में सामग्री लेकर भगवान् को भोग लगाने मन्दिर में गया, शिवजी पार्वतीजी को मौन रहने का संकेत करते हुए चुपके-चुपके पैर रखते हुए रसोई में पहुँच गए और उन्होंने एक-एक व्यंजन उठाकर चखना शुरू कर दिया। भोलेबाबा तो प्रसाद को चखते ही भौंचक्के रह गए ! खीर में चीनी की जगह नमक भरा हुआ था और सब्जियों में चीनी भरी हुई थी।
जैसे ही भोले बाबा ने रोटी का एक ग्रास तोड़कर मुँह में दिया, वे सी-सी करने लगे, क्योंकि रोटी में मिर्च ही मिर्च भरी थी। वे सी-सी करते हुए उल्टे पैर भाग आए और अपने आसन पर जा बैठे।
माँ पार्वती अपने स्वामी की यह हालत देखकर खिलखिलाकर हँस पड़ीं। इससे पहले कि भोलेबाबा पार्वती जी के सामने कुछ सफाई दे पाते, भोला भगत 'ॐ नमः शिवाय्' मंत्र का जप करते हुए आ पहुँचा। उसने भोग को रसोई में मिलाकर उसे पवित्र बना डाला और फिर सेठजी के सामने पत्तल परोसकर हाथ जोड़कर बोला, "सेठजी ! अब आप जी भरकर प्रसाद पाइए।"
भोलेबाबा तो अभी-अभी भक्त की भक्ति से भी जोरदार उसके हाथ की बनी हुई रसोई चख चुके थे, अतः उसे जीमने की बात सुनकर उनके पसीने छूटने लगे। कभी वे भोला का तो कभी पार्वती का मुख देखने लगते। भोला को सेठजी की ढ़ील बर्दाश्त नहीं हुई और बोला, "सेठजी ! अब क्या हो गया आपको ? अभी-अभी तो इतनी उतावली मचा रहे थे ? अब क्यों नहीं जीमते ? आप जीमोगे, तभी तो माताजी भी प्रसाद ग्रहण करेंगी और फिर मैं भी प्रसाद पाऊँगा।"
भोला की ललकार सुनकर भोलेबाबा ने चुपचाप खीर का कुल्हड़ उठाया और सारी नमकीन खीर गटागट पी गए। कुल्हड़ खाली होने की देर थी कि भोला ने उसे झट से भर दिया। अपने प्रिय भक्त के हाथों परोसे हुए भोग में भगवान् को आज दुगना स्वाद आने लगा। भोला परोसता गया और भोलेबाबा पीते गए।
जगन्माता पार्वती भक्त और भगवान् दोनों के प्रेम को देख-देखकर मंत्रमुग्ध होती रहीं। जब सारी रसोई समाप्त हो गई तो भगवान् ने एक जोर की डकार ली। भोला को होश आया और बोला, "वाह सेठजी वाह ! मैं ही बावला था, जो इतनी थोड़ी-सी रसोई बनाई। मुझे पता होता कि आपको प्रसाद ग्रहण करने का इतना शौक है, तो और भी ज्यादा रसोई बनाता।"
भोलेबाबा अपने पेट पर हाथ फेरते हुए सेठानी बनी पार्वतीजी की ओर मुस्कराकर देखते हुए बोले, "पुजारीजी ! मैं इतना रोज कहाँ खाता हूँ ? किन्तु आज प्रसाद इतना स्वादिष्ट बना था कि अपने पर वश ही नहीं रहा और खाता ही चला गया।"
किन्तु तभी भोला भक्त रुआँसा होकर बोला, "सेठजी ! वह तो आपने ठीक किया। लेकिन माताजी तो भूखी ही रह गईं।" ममतामयी पार्वती माँ से भोला का रुआँसा मुख देखा नहीं गया। उन्होंने बची हुई खीर की चार बूँदें अपने कंठ में टपका लीं।
भोलेबाबा द्वारा भोग लगाने से प्रसाद में अद्भुत अलौकिक स्वाद भर गया था। ऐसी सुगंधित और मीठी खीर चखकर जगज्जननी आकण्ठ तृप्त हो गईं और उनके तृप्त होते ही सृष्टि का प्रत्येक प्राणी तृप्त हो गया।
भोला भगत बोला, "सेठजी ! आपने और माताजी ने प्रसाद ग्रहण कर लिया, इससे मुझे अत्यंत संतोष हुआ है। समझ लीजिए कि आप दोनों द्वारा प्रसाद ग्रहण करने से मेरा भी पेट भर गया। मेरी तो वैसे भी महीने में चार-चार एकादशी हो जाती हैं। किन्तु मैं भी एक दाना ले ही लेता हूँ, जिससे कि भोलेबाबा के प्रसाद का अनादर न हो।"
यह कहकर जैसे ही भोला ने खीर के पात्र में लगा चावल का एक दाना उठाकर अपने कंठ में डाला, उसकी जन्म जन्मान्तर की भूख-प्यास मिट गई और समस्त वासनाओं और इच्छाओं की तृप्ति हो गई। उसके ज्ञान के नेत्र खुल गए और उसने देखा कि उसके सम्मुख त्रिलोकीनाथ भगवान् शंकर और जगज्जननी माँ पार्वती आशीर्वाद की मुद्रा में मुस्कराते हुए खड़े हैं।
भोला दौड़कर उनके चरणों में लोट गया। लोटता गया, लोटता गया, और उन्हीं में समा गया।




 

रक्षा बंधन 2023 बुधवार, 30 अगस्त

 रक्षाबन्धन भारतीय धर्म संस्कृति के अनुसार रक्षाबन्धन[ का त्योहार श्रावण माह की पूर्णिमा को मनाया जाता है। यह त्योहार भाई-बहन को स्नेह की डो...